खाड़ी देशों में डेटा केबल्स पर मंडराता खतरा और इंटरनेट की नई जंग

खाड़ी देशों में डेटा केबल्स पर मंडराता खतरा और इंटरनेट की नई जंग

लाल सागर और फारस की खाड़ी के नीले पानी के नीचे बिछा हुआ कांच का बारीक जाल पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को थामे हुए है। हम अक्सर उपग्रहों और वायरलेस तकनीक की बातें करते हैं, लेकिन सच तो यह है कि वैश्विक इंटरनेट डेटा का 97% हिस्सा समुद्र के नीचे दबी इन सबमरीन केबल्स के जरिए सफर करता है। अब खाड़ी क्षेत्र में तनाव के बीच ये केबल्स युद्ध का नया मैदान बन गई हैं। ईरान की हालिया चेतावनियों ने इस डर को सच साबित कर दिया है कि आने वाले समय में तेल के कुओं से ज्यादा कीमती ये डेटा पाइपलाइंस होंगी।

ईरान ने साफ कर दिया है कि अगर उसके हितों पर आंच आई, तो वह इन संचार लाइनों को निशाना बनाने से पीछे नहीं हटेगा। यह केवल एक देश की धमकी नहीं है। यह इशारा है कि हम एक ऐसे युग में प्रवेश कर चुके हैं जहाँ किसी देश को घुटनों पर लाने के लिए मिसाइल दागने की जरूरत नहीं है। बस कुछ केबल्स काट दीजिए, और पूरा देश अंधेरे में डूब जाएगा। बैंकिंग सिस्टम ठप हो जाएंगे, शेयर बाजार क्रैश कर जाएंगे और डिफेंस कम्युनिकेशन पूरी तरह कट जाएगा।

समुद्र के नीचे छिपी दुनिया की सबसे कमजोर नस

लाल सागर एक संकरा रास्ता है। यहाँ से दुनिया के इंटरनेट ट्रैफिक का लगभग 17% से 20% हिस्सा गुजरता है। एशिया को यूरोप से जोड़ने वाली लगभग सभी प्रमुख केबल्स इसी रास्ते का चुनाव करती हैं क्योंकि यह सबसे छोटा मार्ग है। लेकिन यही खूबी इसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी है। लाल सागर का उथला पानी इन केबल्स को असुरक्षित बनाता है। जहाजों के लंगर (anchors) या जानबूझकर की गई तोड़फोड़ यहाँ बहुत आसान है।

जब हम स्वेज नहर के बारे में सोचते हैं, तो हमें बड़े मालवाहक जहाज याद आते हैं। लेकिन उन जहाजों के नीचे जो "डेटा हाईवे" है, उसकी सुरक्षा के लिए कोई ठोस अंतरराष्ट्रीय कानून नहीं है। अगर कोई आतंकी समूह या देश इन केबल्स को काट देता है, तो मरम्मत में हफ्तों लग सकते हैं। खाड़ी क्षेत्र में ईरान और उसके समर्थित गुटों की सक्रियता ने इस चिंता को वैश्विक बहस के केंद्र में ला दिया है।

ईरान की धमकी और हूती विद्रोहियों का रोल

ईरान ने बार-बार पश्चिमी देशों को चेतावनी दी है कि वे उसके समुद्री क्षेत्र और संसाधनों के साथ खिलवाड़ न करें। जानकारों का मानना है कि यमन के हूती विद्रोही, जिन्हें ईरान का समर्थन प्राप्त है, इन केबल्स के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं। फरवरी 2024 में जब लाल सागर में तीन प्रमुख डेटा केबल्स (AAE-1, Seacom और TGN) क्षतिग्रस्त हुई थीं, तो पूरी दुनिया के माथे पर बल पड़ गए थे। हालांकि इसकी वजह स्पष्ट नहीं हो पाई, लेकिन इसने यह साबित कर दिया कि ये बुनियादी ढांचा कितना नाजुक है।

ईरान का तर्क सीधा है। अगर उस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए जाते हैं या उसके तेल निर्यात को रोका जाता है, तो वह भी वैश्विक व्यापार के दूसरे सबसे बड़े स्तंभ—डेटा—को निशाना बना सकता है। यह एक तरह की "एसिमेट्रिक वॉरफेयर" है जहाँ एक छोटा सा हमला अरबों डॉलर का नुकसान कर सकता है।

भारत पर इसका क्या असर होगा

भारत के लिए यह स्थिति किसी डरावने सपने से कम नहीं है। मुंबई और चेन्नई जैसे शहर भारत के इंटरनेट गेटवे हैं। हमारा अधिकांश डेटा ट्रैफिक पश्चिम की ओर जाने के लिए खाड़ी और लाल सागर के रास्तों का ही उपयोग करता है। अगर उस क्षेत्र में केबल्स काटी जाती हैं, तो भारत में इंटरनेट की गति सुस्त पड़ जाएगी।

सिर्फ यूट्यूब या नेटफ्लिक्स नहीं रुकेगा। भारत का विशाल आईटी सेक्टर, जो क्लाउड कंप्यूटिंग और रियल-टाइम डेटा पर निर्भर है, उसे भारी चोट पहुंचेगी। डिजिटल भुगतान प्रणाली (UPI) और बैंकिंग ट्रांजैक्शन धीमे हो सकते हैं या पूरी तरह रुक सकते हैं। भारत सरकार अब इस खतरे को भांपते हुए वैकल्पिक रास्तों की तलाश कर रही है, जिसमें मध्य एशिया के जरिए जमीन से गुजरने वाले फाइबर ऑप्टिक नेटवर्क शामिल हैं।

डेटा केबल्स पर हमले के तीन बड़े खतरे

  • आर्थिक तबाही: शेयर बाजार और बैंकिंग सिस्टम का पूरी तरह बंद होना।
  • सैन्य संचार में बाधा: सेनाओं के बीच गोपनीय सूचनाओं के आदान-प्रदान में देरी।
  • लॉजिस्टिक्स संकट: बंदरगाहों और जहाजों का डेटा लिंक टूटने से सामान की सप्लाई रुकना।

केबल्स का नया विकल्प और बचाव की चुनौतियां

क्या हम इन केबल्स को बचा सकते हैं? जवाब थोड़ा पेचीदा है। हजारों किलोमीटर लंबी केबल की हर इंच पर पहरा देना नामुमकिन है। कुछ लोग एलन मस्क की स्टारलिंक (Starlink) जैसी सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं को समाधान मानते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि सैटेलाइट इंटरनेट अभी उतना डेटा हैंडल नहीं कर सकता जितना कि एक फाइबर ऑप्टिक केबल। एक सिंगल केबल फाइबर प्रति सेकंड कई टेराबिट्स डेटा ले जा सकता है, जो हजारों सैटेलाइट्स की संयुक्त क्षमता से भी ज्यादा है।

कंपनियां अब केबल्स को गहरा दफनाने और उन पर सेंसर लगाने की तकनीक पर काम कर रही हैं। लेकिन समुद्र के नीचे सेंसर लगाना और उनकी निगरानी करना बेहद खर्चीला काम है। इसके अलावा, समुद्र के नीचे के कानून (UNCLOS) केबल्स की सुरक्षा को लेकर बहुत स्पष्ट नहीं हैं। जब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसके लिए कड़े नियम नहीं बनते, तब तक खाड़ी जैसी जगहों पर ये "सॉफ्ट टारगेट" बने रहेंगे।

भविष्य की जंग तेल के लिए नहीं डेटा के लिए होगी

इतिहास गवाह है कि युद्ध हमेशा उन संसाधनों के लिए लड़े गए जो उस समय की सबसे बड़ी जरूरत थे। 20वीं सदी तेल की थी। 21वीं सदी डेटा की है। खाड़ी देशों में जो हलचल हम देख रहे हैं, वह इसी बदलाव का हिस्सा है। ईरान जानता है कि वह अमेरिका या यूरोप की सैन्य शक्ति का मुकाबला सीधे तौर पर नहीं कर सकता, लेकिन वह उनकी डिजिटल लाइफलाइन को काटकर उन्हें बातचीत की मेज पर आने को मजबूर जरूर कर सकता है।

यह केवल ईरान या सऊदी अरब की बात नहीं है। चीन और रूस जैसे देश भी अपनी समुद्री केबल बिछाने की क्षमता बढ़ा रहे हैं ताकि वे पश्चिमी देशों के प्रभाव को कम कर सकें। हम एक ऐसे "स्प्लिंटरनेट" की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ हर शक्ति केंद्र अपना अलग डेटा नेटवर्क बनाना चाहता है ताकि युद्ध की स्थिति में वह सुरक्षित रहे।

अगर आप सोचते हैं कि घर बैठे आपका इंटरनेट सुरक्षित है, तो दोबारा सोचिए। आपकी हर क्लिक समुद्र के नीचे से गुजरती है जहाँ इस वक्त दुनिया की सबसे बड़ी अदृश्य जंग चल रही है। सरकारों को अब साइबर सुरक्षा के साथ-साथ इन फिजिकल केबल्स की सुरक्षा को अपनी नेशनल सिक्योरिटी पॉलिसी का हिस्सा बनाना होगा। वरना अगली बार जब आपका इंटरनेट बंद होगा, तो उसकी वजह आपका राउटर नहीं, बल्कि हजारों मील दूर समुद्र के नीचे कटी हुई एक तार होगी।

इंटरनेट सुरक्षा के इस बदलते दौर में, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की सुरक्षा ही असली संप्रभुता है। आपको अपनी डिजिटल निर्भरता को समझना होगा और वैकल्पिक संचार साधनों के लिए तैयार रहना होगा। डेटा के इस युद्ध में कोई भी सुरक्षित नहीं है।

XD

Xavier Davis

With expertise spanning multiple beats, Xavier Davis brings a multidisciplinary perspective to every story, enriching coverage with context and nuance.